Tuesday, September 14, 2010

संस्कृति और परम्परा की रक्षा जरूरी

अमरेश्वरी चरण सिन्हा
दरभंगा। बिहार सरकार ने विद्यापति को मिथिला क्षेत्र का धरोहर मानते हुए, उन्हें सरकारी स्तर पर सम्मानित किया है। अब उन्हें सरकारी समारोह आयोजित कर याद किया जाना है। जनमानस के बीच महाकवि विद्यापति चिरकाल से स्मरणीय है और रहेंगे। संस्कृत, अवहट्ठ, मैथिली आदि भाषाओं की कृतियां सदैव से पुस्तकों-ग्रंथों व आवाम के कंठों में संरक्षित है। लेकिन इसके साथ ही यह तथ्य भी उजागर हो रहा है कि हम विद्यापति जैसे महान विभूति को सिर्फ राजनैतिक दृष्टिकोण से ही सम्मानित करना चाहते हैं। ऐसा नहीं होता, तो हमारे लिए यह जीने-मरने की बात होती, जब दरभंगा के कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय से महाकवि विद्यापति द्वारा ताल पत्र पर हस्तलिखित 3 खंडों में भागवत की पाण्डुलिपि वर्ष 2003 के 28 नवम्बर को गायब हुई थी। जिसका मामला स्थानीय विश्वविद्यालय, थाना में दिनांक 29 नवम्बर 2003 को 175/3 प्राथमिकी में दर्ज किया गया। इतना ही नहीं, इसके साथ 10 और अमूल्य ग्रंथ चोरी हुए, जिसमें पं. हेमांगद ठाकुर द्वारा रचि 'ग्रहण माला' भी गायब हो गया। जो शायद ज्योतिष जगत में आगामी सैकड़ों वर्षों में ग्रहों की स्थिति को स्पष्टता प्रदान करने में सक्षम था। इतना ही नहीं दरभंगा में राज के सहयोग से स्थापित मिथिला स्नातकोत्तर संस्कृत शोध संस्थान से वर्ष 2003 में 28 मार्च को 26 ग्रंथों व पुस्तकों की चोरी हुई। यह मामला भी विश्वविद्यालय थाना में प्राथमिकी संख्या 45/3 के माध्यम से दिनांक 29 मार्च को दर्ज कराया गया। ऐसे में हम पाते हैं कि वर्ष 2003 में आठ महीने के अन्तराल में कुल 36 पाण्डुलिपि, ग्रंथ व पुस्तकों क चोरी हुई। इतना ही नहीं वर्ष 1981 ई. में चांदी व बहुमूल्य धातुओं से निर्मित घड़ी-घोड़ा आदि के साथ कुछ पाण्डुलिपियों व ग्रंथों की चोरी और वर्ष 2004 ई. में झूमर की चोरी संस्कृत विश्वविद्यालय से हुई थी। कहने का अभिप्राय बिल्कुल स्पष्ट है कि एक ओर सरकार विद्यापति को सम्मानित करना चाहती है और वहीं दूसरी ओर उनकी अमूल्य कृतियों के संरक्षण व संवर्धन को लेकर चिन्तित नहीं है। इसके अलावा राजनैतिक रूप से वातावरण में खेले जा रहे लुभावने प्रयासों से आवाम आनन्दित हो रही है। यह हमें अपने अतीत और संस्कारों से अलग करने के समान है। वस्तुतः यदि हम अपने पूर्वजों की थाती को बचा नहीं पाते, तो इससे हमारी सभ्यता-संस्कृति पर प्रभाव पड़ना स्वभाविक है। दरभंगा और काशी का महत्व आध्यात्म व ज्ञान के क्षेत्र में सनातन धर्मावलंबियों के बीच खासकर इसलिए रहा, क्योंकि अकूट सम्पदाओं से सम्पन्न इन क्षेत्रों से सदैव ज्ञान पुंज विकसित होकर प्राणियों के प्राकृतिक जीवन तत्व को समझने का मार्गदर्शन करते रहे हैं। पर आज की पीढ़ी इसे संरक्षित करने में असफल नजर आ रही है। वहीं लोक लुभाने तत्कालिक व स्वार्थ सिद्धि युक्त राजनीति का प्रभाव इतना बढ़ता जा रहा है कि उत्तराधिकारी उसी को सब कुछ मान कर अपने दायित्व से परे होते जा रहे हैं। ऐसा नहीं है कि इन घटित घटनाओं के बाद आवाम ने आवाज नहीं उठाई या आज भी इसके लिए संघर्ष नहीं हो रहा है। परन्तु उस संघर्ष का आम जनों में जागरण की स्थिति नहीं उत्पन्न होकर, सिर्फ सरकार की घोषणाओं में हो रही दिलचस्पी ने उसके रास्ते की दिशा-दशा बदल दी है। जहां तक इन सवालों के उठने की बात है, तो विधानसभा, सिनेट-सिण्डिकेट की बैठकों में इसे लाया गया। सरकार और प्रशासनिक स्तर पर इसे हल करने की दिशा में आश्वास भी मिला, परन्तु बहुत कुछ हल निकल पाया, ऐसा नहीं लगता। अचानक वर्ष 2010 के अगस्त महीने में समाचार पत्रों में कतिपय पाण्डुलिपियों की बरामदगी से संबंधित खबरें आईं। इस विषय को लेकर संघर्षरत संस्था मिथिला धर्म रक्षार्थ संघर्ष समिति ने बिहार विधान परिषद् के सभापति पं. ताराकांत झा सहित दरभंगा प्रमंडल व जिला के उच्चाधिकारियों से सम्पर्क कर बरामद समान को विधि सम्मत कार्रवाई के साथ पैतृक संस्था को देने के अलावा चोरी में संलिप्त लोगों को कानूनी रूप से दंडित करने का प्रस्ताव दिया। लेकिन अभी तक इन दोनों ही सवालों पर कुछ हुआ नहीं है। हां! यह जरूर बताया जा रहा है कि प्रक्रिया जारी है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सरकार सिर्फ महाकवि विद्यापति को सरकारी समारोहों में यादकर आवाम को अपनी ओर आकर्षित करना चाहती है या वह मिथिला के धरोहरों को भी संरक्षण व संवर्धन देने के प्रति सचेत है। एक ओर हम विद्यापति के सम्मान से प्रसन्न हों, वहीं दूसरी ओर उनकी हस्तलिखित ताल पत्र की पाण्डुलिपियां चोरी के 7 वर्षों बाद भी वापस नहीं हो सके, जिसके संबंध में यह बताया जाता है कि इसका अन्तराष्ट्रीय बाजार में कीमत करोड़ों में है। वहीं आवाम सिर्फ मूकदर्शक बनकर रहना चाहती है और चन्द लोक-लुभावने नारों से प्रसन्न हो शान्त बैठी है। यहां यह उल्लेख करना आवश्यक है कि यह सवाल न किसी सरकार या पार्टी से जुड़ा है। बल्कि यह देश और खासकर मिथिला की ऐतिहासिक स्मिता से जुड़ा प्रश्न है, जिसके लिए केन्द्र और राज्य सरकारों में विभाग खोले गए है और इस पर सरकारी धन खर्च किये जाते हैं। तब फिर आखिर क्या कारण है कि देश के ऐसे अमूल धरोहरों को संरक्षित नहीं रखा जा पा रहा है। आज जब भौतिकवाद का असर जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सिर चढ़कर बोल रहा है, ऐसे में अपने अतीत के प्रति उदासीनता कोई सुनहरे भविष्य की ओर हमें ले जा सकेगा, यह मानकर बैठ जाना उचित नहीं है। क्योंकि भारतीय दर्शन के आयाम में पूर्वजों के सम्मान व आशीष की कामना सन्निहित है। जिसे प्रत्येक युग में संरक्षित किया गया है। आज फिर एक बार सांसारिक भंवर जाल को तोड़कर अतीत में झांकते हुए, उसे आदर्श मानकर चलने की आवश्यकता है। शायद तभी भारत का मौलिक सत्य व स्वरूप को पुनः जागृत अवस्था में पाया जा सकता है। इस सनातन सत्य के मर्म को समझने की आवश्यकता है।

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